Sarvesh Kaushal

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पंचतत्त्व: सनातन प्रकृति की अमोघ शक्तियाँ — और बाढ़ की चेतावनी

पंचतत्त्व: सनातन प्रकृति की अमोघ शक्तियाँ — और बाढ़ की चेतावनी
“पृथिव्यां धृतं सर्वं, पृथिव्या हि प्रतिष्ठितम्।”
— अथर्ववेद 12.1.1
सनातन हिन्दू दर्शन के मूल में ‘पंचतत्त्व’ — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश — वे पाँच मौलिक तत्व हैं जिनसे संपूर्ण सृष्टि की रचना हुई है। ये केवल दार्शनिक अवधारणाएँ नहीं, बल्कि जीवन के नियामक और प्रकृति की अमोघ (अपरिहार्य) शक्तियाँ हैं।
आज जब विश्व के अनेक हिस्सों में भयंकर बाढ़ें कहर बरपा रही हैं, जब नदियाँ अपने किनारे तोड़ रही हैं, और जब जल ही जीवन का संकट बन गया है — यह हम सबके लिए एक गंभीर चेतावनी है: कि प्रकृति के पंचतत्त्व को अनदेखा करना या उनसे खिलवाड़ करना मानव के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकता है।
🔹 पंचतत्त्व और उनका प्रभाव
1.पृथ्वी (भूमि) – स्थिरता और सहनशीलता का प्रतीक। परन्तु जब उसकी गोद से अतिक्रमण होता है, वह भी कांप उठती है।
2.जल (आप) – जीवनदायी, शुद्ध करने वाला। परंतु जब वह संतुलन खो दे, तो बाढ़ बनकर नगरों को डुबो देता है।
“अपो हि ष्ठा मयोभुवस्त न ऊर्जे दधातन।” (ऋग्वेद 10.9.1)
– जल जीवनदायी है, ऊर्जा का स्रोत है – परंतु यही जल अनियंत्रित हो जाए तो मृत्युदायी भी हो सकता है।
3.अग्नि (तेज) – शक्ति, पवित्रता, उर्जा का प्रतीक। पर नियंत्रण न हो तो विनाशक अग्निकांड।
4.वायु (हवा) – प्राणवायु, गति और संचार का स्रोत। परंतु विकराल रूप ले तो तूफान और चक्रवात बन जाती है।
5.आकाश (Ether/Space) – आभास और अनंतता का प्रतीक। यही मंच है जिसमें अन्य चारों तत्त्व क्रियाशील होते हैं।
🔹 बाढ़: जलतत्त्व की चेतावनी
जलतत्त्व की उपेक्षा या अनादर जब हम करते हैं — जैसे नदियों के प्रवाह को रोकना, जलाशयों को पाटना, वर्षा जल का दुरुपयोग — तो वह विनाश का कारण बनता है।
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत…”
(श्रीमद्भगवद्गीता 4.7)
जब जब धर्म (प्राकृतिक संतुलन) का ह्रास होता है, तब तब प्रकृति स्वयं अवतार लेती है — और कभी वह अवतार बाढ़ के रूप में भी आता है।
🔹 हमारी भूमिका: पंचतत्त्वों के साथ सामंजस्य
आज की बाढ़ें हमें याद दिलाती हैं कि मनुष्य चाहे जितनी भी प्रौद्योगिकी में प्रगति कर ले, वह प्राकृतिक तत्वों से बड़ा नहीं हो सकता। पंचतत्त्व हमें जीवन की मौलिकता की ओर लौटने का आह्वान करते हैं।
हमें चाहिए:
•नदी और जल स्रोतों की रक्षा करें
•वृक्षारोपण और भू-संरक्षण करें
•पारंपरिक जल-प्रबंधन तकनीकों को पुनः अपनाएं
•प्रकृति के साथ द्रोह नहीं, संवाद करें
ईश्वर सभी जीवों की रक्षा करें
आज जब हमारे देश और विश्व में कई जगह बाढ़ से जनजीवन प्रभावित है, हम सबको यह प्रार्थना करनी चाहिए:
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।”
— उपनिषद
ईश्वर सबका कल्याण करें, सबकी रक्षा करें, और हम सबको प्रकृति के पंचतत्त्वों का आदर करने की चेतना दें।
🙏 ओम् शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
सादर
सर्वेश कौशल

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